पहाड़ में खेती : बंदर और सूअर — सोलर हूटर प्रदान करे सरकार

पहाड़ी कृषि पर वन्यजीवों का दबाव और सोलर हूटर को लेकर नीति प्रस्ताव

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डॉ. किशोर कुमार पंत
सोशल एक्टिविस्ट, ग्रामीण आजीविका संवर्धन के विशेषज्ञ

उत्तराखंड का पहाड़ आज एक ऐसे द्वंद्व से गुजर रहा है, जहाँ प्रकृति वरदान भी है और अभिशाप भी। एक ओर पर्वतीय खेतों की सीढ़ियाँ जैविक और शुद्ध अन्न उगाने की अनुपम परंपरा का प्रतीक हैं, वहीं दूसरी ओर यही खेत जंगली जानवरों की बर्बरता से उजड़ रहे हैं। बंदरों और सूअरों का आतंक इतना गहरा हो चुका है कि किसान का मनोबल टूट चुका है। यह केवल कृषि की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक अस्तित्व का संकट है।

किसान की अथक मेहनत और उजड़ते सपने

पर्वतीय किसान दिन-रात श्रम करता है। महिलाएँ लकड़ी और पानी ढोती हैं, पुरुष खेतों में बैल या हल लेकर पसीना बहाते हैं। महीनों की मेहनत के बाद जब फसल पकने लगती है, तो रात-दिन की जागरदारी शुरू होती है। लेकिन बंदरों के झुंड और सूअरों की टोली सब कुछ नष्ट कर देती है। किसान देखता रह जाता है, उसकी मेहनत और उम्मीदें कुछ ही घंटों में मिट्टी में मिल जाती हैं।

बंदरों और सूअरों का बढ़ता संकट

वन्यजीव संरक्षण कानूनों और प्राकृतिक शत्रुओं की कमी के कारण बंदरों की संख्या अनियंत्रित हो चुकी है। वे खेतों में घुसकर केवल खाते नहीं, पौधों को उखाड़कर बरबाद भी कर देते हैं। जंगली सूअर रात के अंधेरे में फसलें खोद डालते हैं, आलू-मक्का जैसी पूरी उपज नष्ट कर देते हैं। यह हानि केवल आर्थिक नहीं, बल्कि मानसिक और सामाजिक विघटन का कारण बन चुकी है।

आर्थिक तबाही और पलायन की त्रासदी

किसानों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि जब खेत ही सुरक्षित नहीं, तो खेती क्यों करें? यही सोच पलायन को जन्म देती है। गांव खाली हो रहे हैं, घरों के आँगन सूने हो रहे हैं, और बुजुर्ग अकेलेपन की यातना झेल रहे हैं। यह केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था का संकट नहीं, बल्कि उत्तराखंड की आत्मा पर गहरा आघात है।

सरकार की योजनाएँ और जमीनी हकीकत

बंदरों की नसबंदी योजनाएँ धीमी और अप्रभावी साबित हो रही हैं। सूअरों पर नियंत्रण की कोई ठोस योजना नहीं है। फसल बीमा भी काश्तकारों की इस समस्या को नहीं छूता। वन्यजीव संरक्षण कानून किसानों को असहाय बनाकर खड़ा कर देता है — फसल बचाना अपराध जैसा लगता है। यह विडंबना है कि एक ओर किसान भूख और कर्ज से जूझ रहा है, दूसरी ओर उसे अपनी फसल की रक्षा करने का अधिकार भी नहीं।

सोलर हूटर : एक व्यवहारिक समाधान

तकनीक की ओर देखना अब विवशता ही नहीं, बल्कि आवश्यकता है। सोलर हूटर ऐसा उपकरण है जो आवाज और रोशनी से जंगली जानवरों को खेतों से दूर रख सकता है। यह पर्यावरण अनुकूल है और किसानों के लिए बड़ी राहत बन सकता है। लेकिन पहाड़ी किसानों की आर्थिक स्थिति इनकी खरीद की अनुमति नहीं देती। यही वह बिंदु है जहाँ सरकार को हस्तक्षेप करना चाहिए। सोलर हूटर को प्रत्येक गांव तक अनुदान या मुफ्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए।

“हम खेती छोड़ देंगे तो पहाड़ भी सूना हो जाएगा। हमें सिर्फ सहारा चाहिए, ताकि हम अपनी मिट्टी और अपने खेतों से जुड़े रह सकें।”

यह कोई एक किसान की आवाज नहीं, बल्कि हजारों किसानों का आर्तनाद है, जिसे शासन-प्रशासन को अनसुना नहीं करना चाहिए।

तुरंत लागू किए जाने योग्य कदम

  • हर प्रभावित गांव में सोलर हूटर की मुफ्त/अनुदानित आपूर्ति और रखरखाव की जिम्मेदारी।
  • रात्री चौकसी के लिए सोलर लाइट + हूटर कॉम्बो यूनिट्स की स्थापना।
  • जंगली सूअर नियंत्रण हेतु वैज्ञानिक व मानवीय तरीके—बैरिकेडिंग, ट्रेंचिंग, सामुदायिक निगरानी।
  • किसानों के लिए त्वरित राहत कोष व वास्तविक नुकसान का आकलन कर सीधी सहायता।
  • वन्यजीव कानूनों में संशोधन, ताकि फसल-रक्षा को अपराध न माना जाए।

निष्कर्ष

उत्तराखंड का भविष्य तभी सुरक्षित है जब उसका किसान सुरक्षित हो। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो खेती का परित्याग और पलायन अपरिवर्तनीय सत्य बन जाएगा। सरकार से अपेक्षा है कि वह बंदरों और सूअरों से जूझते किसानों को तत्काल राहत प्रदान करे, और सोलर हूटर जैसी तकनीकों को व्यापक रूप से उपलब्ध कराए। किसान की रक्षा करना केवल कृषि को बचाना नहीं, बल्कि उत्तराखंड की संस्कृति, उसकी थाली, उसकी परंपरा और उसकी अस्मिता को बचाना है।

✍ यह सम्पादकीय उत्तराखंड के उन सभी किसानों को समर्पित है, जो कठिनाइयों के बावजूद अपनी मिट्टी से जुड़े रहने का साहस कर रहे हैं।